Wednesday, April 20, 2016

देश व् समाज में 'आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं' व् 'लोगो की आर्थिक परेशानियों' सम्बंधित 'समाज सुधार व् सामजिक आत्मसम्मान' सम्बंधित लेख

देश में 'आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं' व् 'लोगो की आर्थिक परेशानियों' सम्बंधित चिंतन व् मन की बात
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यह लेख देश व् समाज के उन् युवाओं को समर्पित है जो आज जीवन में अच्छी जिंदगी जी रहें हैं परन्तु स्वयं व् अपने परिवार के किसी वहृद 'आपातकालीन स्वास्थ्य परिस्थितियों' में अपने आप को बेबस पातें है परन्तु घोर परिस्थितियों में भी 'आशावान' होतें हैं और जिंदिगी से जुझारू हो जातें है।
ऐसे तो कई उदाहरण पेश किया जा सकता है परन्तु अभी एक केस के बारें में बताना चाहूँगा और एक 'युवा  के मन मस्तिस्क' में इससे सम्बंधित क्या चल रहा है, उस चिंतन को आप सब के सामने पेश कर रहा हूँ।

पश्चिम बंगाल के एक क्षेत्र 'आद्रा' के एक ऐसे जुझारू युवा विकाश की जीवंत कहानी है जिनके पुत्र को जन्मजात कोई स्वास्थ्य सम्बंधित बीमारी रही है। इनका व्यापार अच्छा चल रहा है। अतः अपने पुत्र के इलाज़ में इन्होंने कलकता-बंगलोर-चेन्नई आदि के विभिन्न बड़े बड़े अस्पतालों में चिकित्सा करवाई। फिर भी उनके पुत्र की यह अनोखी बीमारी ठीक होने का नाम नहीं ले रही थी। कई लाख प्रति साल वह अपने पुत्र के इलाज़ में खर्च कर रहें थे। फिर 4 वर्ष पूर्ण होने पर एक बड़े शहर के एक अस्पताल ने उन्हें बताया कि 'एक बड़ी तकनीकी ऑपरेशन' का भारत में इलाज़ चालू हो चूका है और सम्भवतः इससे इनके पुत्र का पूर्णतः इलाज़ सम्भव हो। परन्तु इसके इलाज़ के लिए 'एक अन्य स्वस्थ बालक(जो शारीरिक तकनीकियों से उनके पुत्र से 10 पॉइंट में मैच होता हो) व् लगभग 35 से 40 लाख की जरूरत होगी। स्वस्थ बालक जो उनके पुत्र से genes में मैच खाता हो से 'bone marrow transplant' किया जाएगा। bone marrow शरीर की वह प्रत्यंग होती है जिससे शरीर में 500 अरब रक्त कोशिकाओं का निर्माण प्रतिदिन होता है अर्थात शरीर के स्वस्थ सञ्चालन में अति मुख्य भूमिका। इसके ठीक से कार्य न करने से शरीर में कई समस्याएं उतपन्न हो जाती है और यह एक अत्यंत जटिल ऑपरेशन की प्रक्रिया है जिसमे बच्चे को न्यूनतम 6 महीने अस्पताल में ही रखा जाएगा।
तरह तरह की बात इस पिता को बोली गयी लोगो द्वारा। पैसे और कठिनाइयों को देखते हुए। उन्हें निराशवान होने के लिये कह दिया गया। परन्तु पिता आशावान रहा और है। उन्हें अपनी कुलदेवी श्री रानी सती दादीजी पर पूर्ण भरोसा है कि कुछ न कुछ उपाय जरूर होंगें। अपने पुत्र के इलाज़ के लिए रुपये-पैसों के इंतेज़ाम जरूर होंगे। इसी बीच उनका पुत्र 5 वर्षीय हो गया व् अस्पताल से खबर आई कि 10 पॉइंट में से 09 पॉइंट तक के gene मैच खाने वाला एक 'transplant' के लिए अन्य बालक मिल गया है, चाहे तो 'पिता अपने पुत्र' का इलाज़ करवा सकता है।
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अब आद्रा का अग्रवाल परिवार सभी और चहुँ और से कैसे पुत्र इलाज़ हेतु 'फण्ड' की व्यवस्था हो सकती है पे लग जाता है। कोई सामाजिक संस्थाओं के शीर्ष पदाधिकारी के पास जा रहा है, कोई सम्बंधियों से सम्पर्क में हैं तो कोई ऑनलाइन इंटरनेट के माध्यम से मदद की अपील में लगा हुआ है।
एक अन्य राष्ट्रीय व्यापी सामाजिक संस्था जिनसे ये पिता जुड़े हुए हैं वहां किसी अन्य प्रान्त के एक सदस्य को इस केस की जानकारी उनके एक परिचित के माध्यम से होती है। उस प्रान्त के इस सदस्य ने इस केस में अपनी छान बिन करने के दौरान इस केस में व्याप्त 'मानवीय सम्वेदना, एक पिता की विवशता फिर भी उसके आशावादी व् जुझारू व्यक्तित्व' से वह प्रभावित होता है और इस केस को विभिन्न whatsup ग्रुप के माध्यम से राष्ट्र में हज़ारों सदस्यों को भेजता है और 'आर्थिक मदद' की अपील की जाती है।
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इस संस्था के विभिन्न प्रान्त के सम्वेदनशील सदस्यों द्वारा 'आर्थिक सहयोग' निरन्तर आने शुरू हो रहें हैं। कुछ लोगो से सम्वाद हो रही है इस गम्भीर विषय पर व् इस लेख के लेखकर्ता के मन-मस्तिस्क में चिंतन का दौर शुरू होता है। उसके विभिन्न लोगों से, समाज के सदस्यों से वार्तालाप व् उसके बाद उठे मन में सवाल को इस लेख के माध्यम से रखा जा रहा है।
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इंटरनेट के माध्यम से हुई अपील के कुछ दिन बाद
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- आज दिन में दक्षिण के कर्नाटक के एक उत्कृष्ठ शाखा के एक माननीय पदाधिकारी का कॉल आया। वे आद्रा के युवा साथी के लिए यह 'सहयोग वाली कार्यक्रम' राष्ट्रीय स्तर पर निष्पादित करना चाह रहें हैं। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि राष्ट्र के लगभग 20 हज़ार सदस्यों से न्यूनतम 100 रूपये लेकर युवा विकाश की मदद की जाय। आज उनकी बात राष्ट्र के पदाधिकारियों से होने वाली थी। कल उनसे अपडेट लूँगा।
-20 लाख की रकम बड़ी है। उन्होंने मुझे कॉल करने से पूर्व आद्रा भी बात की। युवा भाई विकाश के पुत्र के ऑपरेशन के प्रति प्रयास कर उन्होंने अत्यंत सम्वेदना का परिचय दिया। वे अपने दक्षिण क्षेत्र के प्रान्तों जैसे तमिलनाडु, पॉन्डिचेरी, आंध्रा व् कर्नाटक प्रांतों के साथियों से इस विषय में संपर्क बनाये हुए हैं। पढ़े लिखे व् शहरों में तेज़ रफ़्तार जिंदगी में रहने वाले युवा भी किसी अनजान व्यक्ति के दुःखो के प्रति इतनी सम्वेदनशील हो सकतें है जानकर ख़ुशी हुई।

-आज मेरी इस विषय में अपने गृह प्रान्त के माननीय प्रांतीय अध्यक्षजी से भी बात हुई है। उन्होंने पुनः इस विषय पर गम्भीरता से अन्य प्रांतीय पदाधिकारियों से बात करने का आश्वाशन दिया है। उन्होंने स्वयं के भी सहयोग की स्वेक्षिक सहमति दी।

-इसके आलावा राष्ट्र के पूर्वी क्षेत्र के एक प्रान्त के अन्य राष्ट्रीय स्तर के उच्च पदाधिकारी से इस विषय पर बात हुई। उन्होंने हम सबों के प्रयास की सराहना की परन्तु उनका सुझाव रहा कि कुछ ही सक्षम लोगो से निजी स्तर पर मिलकर सहयोग का प्रयास किया जाय। जैसे कोई औद्योगिक घराना या फिर नियमित दान दाता। उन्होंने ऐसा कहा क्योंकि आये दिन शाखाओं व् प्रान्तों में 'आर्थिक सहयोग' के लिए आवेदन आते ही रहतें है और यह कोई नई रीत नही बन जाय।
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आज की विभिन्न स्तर के उच्च पदाधिकारियों से बात कर मुझे ठीक एक वर्ष पूर्व के एक वृतांत की स्मृति ताजा हो गयी। मेरे गृह क्षेत्र में एक बड़ा आयोजन हो रहा था। बड़े स्तर का खर्च हुआ था-लगभग 50 लाख का। राष्ट्र के एक बड़ी मन्दिर कमिटी के एक माननीय उच्च पदाधिकारी का शहर में आगमन हो रहा था। यह मन्दिर कमिटी साल भर में 'सैकड़ो कड़ोड़ रुपये' अपने समाज से चढ़ावे-चंदे के रूप में प्राप्त करती है। कई सालों से मन में प्रश्न रहता था कि इन 'रूपयों' का कमिटियाँ क्या करती है। शहर में हो रहे इस व्यापक आयोजन के कोर कमिटी में होने के वजह से माननीय महोदय से नजदीकियां बढ़ी।
आयोजन के पश्चात एक दिन इनसे मैंने सदी की सबसे बड़ी प्रश्नावली इनको whatsup के माध्यम से भेज दी। एक वर्ष बीत गये हैं आज तक जवाब नहीं आया है। निम्नलिखित प्रश्न पूछे थे मैंने क्रमबद्ध करके उन्हें:-

क। क्या यह सत्य है कि आपकी मन्दिर में सैकड़ो कड़ोड़ चढ़ावे के रूप में प्राप्त होता है?
ख। क्या यह सत्य है कि 'इन चढ़ावे के रुपये' मन्दिर कोर कमिटी के सदस्य 1-2 टके ब्याज में उठाते है और यह बाज़ार में सालो से 'रोटेट' होता रहा है?
ग। क्यों नहीं मन्दिर कमिटी के सदस्य इन धर्मादे के रुपये का सदुपयोग 'नए यात्री आवास' व् भक्तों-श्रद्धालुओं आदि पर खर्च करती है। कुछ विशेष वार्षिक आयोजनों में विश्व के कोने कोने से आये भक्तगण तम्बू व् जमीन में विश्राम करने के लिए विवश होतें हैं।
घ। आज के दिन पूर्ण समाज में कोई भी 'स्वास्थ्य सम्बंधित आपातकालीन' परिस्थितियां आती है तो वे विदेशी मिसिनरीज(विदेशी धार्मिक फण्ड) के दक्षिण के अस्पतालों जैसे वेल्लोर-चेन्नई आदि में जातें हैं। क्यूँ नहीं अपने मारवाड़ी समाज के इस सबसे बड़े 'मन्दिर' में प्राप्त 'करोड़ो-अरबों' के चढ़ावे-चन्दो का सदुपयोग हज़ारो कड़ोड़ रूपये की 'एक multi-super स्पेशलिटी अस्पताल' खोलने में लगाया जाय, जिससे भक्तगण व् पुरे भारत से आया हुआ समाज आपातकालीन परिस्थितयों में इसकी सेवा का लाभ उठा सकता है?
ङ। चूँकि मन्दिर में चन्दा-चढ़ावा पुरे राष्ट्र से आये भक्त गण देते हैं, तो क्या मन्दिर कमिटी अपने आय-व्यय का लेखा जोखा क्या तैयार करती है? अगर हाँ तो क्या इसकी एक प्रति मुझे प्राप्त हो सकती है?
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आज तक माननीय महोदय का जवाब नहीं आया।
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मैं आज से 5-10 वर्ष आगे की सकरात्मक परिकल्पना करता हूँ कि निश्चित रूप से समाज में बदलाव आएंगे। अपने पारम्परिक मूल्यों व् धरोहरों को सहजते हुए 'समाज सुधार व् सामजिक सम्मान' में 'अपना समाज' अन्य समाजों में  'उदहारण व् एक मिशाल' पेश करते रहेगा। युवा वर्ग कठिन विषयों में अपने विचार स्वछँदता से निर्भीकता से बड़ो-बुजुर्गों से समानपूर्वक पूछ पाएंगे। सामाजिक व् धार्मिक कार्यकिलापों में 'पारदर्शिता' लायी जायेगी। समाज के सभी बड़े धर्मस्थलियों में 'बड़े जटिलतम बिमारियों के इलाज़' के लिए 'बड़े अस्पताल' व् 'खुशहाल जिंदगी जीने के शोध शाला' खुलेंगे ताकि समाज के पैसों का सदुपयोग के साथ समाज के सभी वर्ग को राहत मिल सके।

मुझे पूर्ण आशा है आद्रा के हमारे युवा साथी के पुत्र के इलाज़ के लिए समाज का सक्षम वर्ग स्वेक्षिक रूप से सामने आएगा व् 'सामाजिक एकजुटता व् भाईचारा' का एक उदहारण पेश कर सकेगा। विशेष धन्यवाद अभी तक के सभी साथियों को जिन्होंने युवा विकाश को आर्थिक मदद पहुँचायी है व आगे भी उनके कठिन समय में उनका साथ देंगे।

अपनी प्रतिक्रिया जरूर देंगे। फिर कभी कोई अन्य ज्वलन्त मुद्दे के साथ आप सबों के समक्ष पेश होऊंगा।

आपका युवा साथी।

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