श्री गोपाल गोशाला के सन्दर्भ में एक दृस्तान्ट व् अपील।
मेरे विभिन्न युवा साथियों, अग्रज व् पितृ तुल्य सदस्य गण, आज कुछ ऐसी बातें मैं आपलोग के समक्ष रख जो पूर्व में मैंने सोचा था कि किसी को शेयर नहीं करूँगा। परंतु पिछले 2-3 प्रातःकालीन स्वप्न में गो वंसों के लागातार दर्शन होने से प्रेरणा मिली कि यह बातें आप सब को बताऊँ। यह बात पूर्ण रूप से गो वंस के रख रखाव व् गोपाल गोशाला के नए सिरे से जीर्णोद्धार के विषय में है जो कि नए संचालकों द्वारा बखूबी किया जा रहा है और हम सब उनको इस बात का धन्यवाद देतें हैं।
मैं पिछले 7-8 दिनों से श्री पचम्बा गोपाल गोशाला में संचालकों के नए initiative के अंतर्गत वहाँ प्रातः टहलने-व्यायाम-प्राणायाम करने जा रहा था। इसी क्रम में प्राणायाम के बाद गायों के विभिन्न शेड में visit करता हूँ। परंतु मेरी विशेष रुचि ठूंठ व् विकलांग गायों के शेड में जाना रहता है क्योंकि वहीँ उन गायों को सबसे ज्यादा ध्यान व् रख रखाव की आवश्यकता होती है और चूँकि वो बिना दूध देने वाली होती है सभी सेवा के क्रम में(जैसे साफ़ सफाई, चारा देना आदि) में उनके शेड का no दूध देने वाली गायों के बाद व् सबसे अंतिम में आता है।
अब यह घटना जो मैं आप सब के समक्ष पेश कर रहा हूँ यह 5 से 6 दिन पहले की घटना है जो वहां के पूर्व प्रबंधन की घोर लापरवाही व् negligence को दर्शाता है।
हर दिन के प्राणायाम के बाद उस दिन भी मैं श्री गोपाल गोशाला के मंदिर के पीछे वाली शेड में गया तो देखा कि एक कम कद वाली सफ़ेद गाय जमीन में गिरी हुई है और उसके ऊपर मछर मंडरा रहे थे।
मैं समझ गया कि इस गाय की मृत्यु हो चुकी है। मेरे साथ उस समय विदेशी नाम का ग्वाला था। उसको मैंने जैसे ही यह दृश्य दिखाया वह गाय के शेड के खिड़की से ही अंदर जा कर जमीं पर लेटे गाय के नब्ज़ को देखा और बोला ये तो मृत है।
हालाँकि मुझे बाद में बताया गया कि वो फलानि गाय पिछले 2-3 दिनों से बीमार थी, मैं वहां खड़ा विष्मय हो कर सोचने लगा। क्या यह स्तिथि हमारे समाज की गोशाला का है की प्रातः सूरज उगने के ढाई घंटे के बाद तक एक मृत गो वंश शेड में पड़ी है-उस पर मक्खी भिनभिना रही है-अगल बगल में अन्य गो वंश खड़े-बैठे उसे देख रहें हैं और गोशाला का मेनेजर व् अन्य उस मृत पशु को वहां से हटाने के लिए सर्वप्रथम अपने आप को बाध्य नहीं मानता अपितु ठूंठ गो वंस की सेवा अंतिम कार्य मानता है।
जब तक वहाँ नये संचालक पहुँचते मैंने प्रबंधक से पूछा इन मृत गायों को ले जाने वाले इन्हें खा लेते होंगे तो उसने मेरे सामने तो इस बात की हामी दे दी परंतु नए संचालकों के सामने अपनी बात से पलटते हुए कहा इन गायों को जंगल में फिकवा देतें हैं।
मैं यह समझ गया कि अपने निजी स्वार्थ के कारणों से उसने अलग बात कही। तब तक मैं ग्वाले विदेशी से एक पर्सनल टच बना चूका था। मेरी विदेशी से निचे ऐसी बात हुई। यह बातें आश्चर्य जनक रूप से इस मृत गाय प्रकण्ड से ठीक पहले की है। मैं अपने आपको NKB के रूप में पेश कर रहा हूँ;-
NKB: क्या लोग यहां अपनी गाय दान में देतें हैं और कैसी गाय होती है
विदेशी: ज्यादातर बीमार या ना दूध देने वाली गायें ही दान स्वरुप आती है। कभी कभी बाछे भी आतें हैं ।
NKB: ये गायें मरती क्यों हैं
विदेशी: ऐसी ठूँठ गायें जो दान में दी जाती है उसे मंदिर के पीछे वाली शेड में रखा जाता है। वहाँ कुछ सालो पहले के repair में गलती से चिकना वाला नहला मरवा देने से गायें अपने ही मलमूत्र से पिसल कर गिर जाती है और गायों (के मलमूत्र वाला कोमल स्थान) टूट जाने से 2-3 दिन में उनकी मौत हो जाती है।
विदेशी: और नयी दान वाली गायें आपस में लड़ती है तो भी उनके गिरने से मौत हो जाती है।
NKB: कितनी ऐसी गायें मरती होंगी।
विदेशी: लगभग हफ्ते में 2 से 3
NKB: तब तो गाय बहुत घट जाती होगी।
विदेशी: नहीं ऐसा नहीं है। जितनी जाती है उतनी आ जाती है। लगभग बराबर हिसाब रहता है। अपनी दूध वाली नहीं, मरती बाहर वाली जाती है।
विदेशी मुझे यही दिखाने चिकने नहले वाले शेड(ठूँठ गौओं की) में ले गया था जहां तदुपरांत मृत गाय को मैंने उसे दिखया।
मैं वहाँ विस्मित खड़ा यह सोचने लगा की 2-3 हफ्ते में यानि महीने में 8-10 व् साल में 100 से ज्यादा गो वंश की मौत अपने ही गोशाला में। आश्र्चजनक पहलू था ये।
क्रमश......
मेरे विभिन्न युवा साथियों, अग्रज व् पितृ तुल्य सदस्य गण, आज कुछ ऐसी बातें मैं आपलोग के समक्ष रख जो पूर्व में मैंने सोचा था कि किसी को शेयर नहीं करूँगा। परंतु पिछले 2-3 प्रातःकालीन स्वप्न में गो वंसों के लागातार दर्शन होने से प्रेरणा मिली कि यह बातें आप सब को बताऊँ। यह बात पूर्ण रूप से गो वंस के रख रखाव व् गोपाल गोशाला के नए सिरे से जीर्णोद्धार के विषय में है जो कि नए संचालकों द्वारा बखूबी किया जा रहा है और हम सब उनको इस बात का धन्यवाद देतें हैं।
मैं पिछले 7-8 दिनों से श्री पचम्बा गोपाल गोशाला में संचालकों के नए initiative के अंतर्गत वहाँ प्रातः टहलने-व्यायाम-प्राणायाम करने जा रहा था। इसी क्रम में प्राणायाम के बाद गायों के विभिन्न शेड में visit करता हूँ। परंतु मेरी विशेष रुचि ठूंठ व् विकलांग गायों के शेड में जाना रहता है क्योंकि वहीँ उन गायों को सबसे ज्यादा ध्यान व् रख रखाव की आवश्यकता होती है और चूँकि वो बिना दूध देने वाली होती है सभी सेवा के क्रम में(जैसे साफ़ सफाई, चारा देना आदि) में उनके शेड का no दूध देने वाली गायों के बाद व् सबसे अंतिम में आता है।
अब यह घटना जो मैं आप सब के समक्ष पेश कर रहा हूँ यह 5 से 6 दिन पहले की घटना है जो वहां के पूर्व प्रबंधन की घोर लापरवाही व् negligence को दर्शाता है।
हर दिन के प्राणायाम के बाद उस दिन भी मैं श्री गोपाल गोशाला के मंदिर के पीछे वाली शेड में गया तो देखा कि एक कम कद वाली सफ़ेद गाय जमीन में गिरी हुई है और उसके ऊपर मछर मंडरा रहे थे।
मैं समझ गया कि इस गाय की मृत्यु हो चुकी है। मेरे साथ उस समय विदेशी नाम का ग्वाला था। उसको मैंने जैसे ही यह दृश्य दिखाया वह गाय के शेड के खिड़की से ही अंदर जा कर जमीं पर लेटे गाय के नब्ज़ को देखा और बोला ये तो मृत है।
हालाँकि मुझे बाद में बताया गया कि वो फलानि गाय पिछले 2-3 दिनों से बीमार थी, मैं वहां खड़ा विष्मय हो कर सोचने लगा। क्या यह स्तिथि हमारे समाज की गोशाला का है की प्रातः सूरज उगने के ढाई घंटे के बाद तक एक मृत गो वंश शेड में पड़ी है-उस पर मक्खी भिनभिना रही है-अगल बगल में अन्य गो वंश खड़े-बैठे उसे देख रहें हैं और गोशाला का मेनेजर व् अन्य उस मृत पशु को वहां से हटाने के लिए सर्वप्रथम अपने आप को बाध्य नहीं मानता अपितु ठूंठ गो वंस की सेवा अंतिम कार्य मानता है।
जब तक वहाँ नये संचालक पहुँचते मैंने प्रबंधक से पूछा इन मृत गायों को ले जाने वाले इन्हें खा लेते होंगे तो उसने मेरे सामने तो इस बात की हामी दे दी परंतु नए संचालकों के सामने अपनी बात से पलटते हुए कहा इन गायों को जंगल में फिकवा देतें हैं।
मैं यह समझ गया कि अपने निजी स्वार्थ के कारणों से उसने अलग बात कही। तब तक मैं ग्वाले विदेशी से एक पर्सनल टच बना चूका था। मेरी विदेशी से निचे ऐसी बात हुई। यह बातें आश्चर्य जनक रूप से इस मृत गाय प्रकण्ड से ठीक पहले की है। मैं अपने आपको NKB के रूप में पेश कर रहा हूँ;-
NKB: क्या लोग यहां अपनी गाय दान में देतें हैं और कैसी गाय होती है
विदेशी: ज्यादातर बीमार या ना दूध देने वाली गायें ही दान स्वरुप आती है। कभी कभी बाछे भी आतें हैं ।
NKB: ये गायें मरती क्यों हैं
विदेशी: ऐसी ठूँठ गायें जो दान में दी जाती है उसे मंदिर के पीछे वाली शेड में रखा जाता है। वहाँ कुछ सालो पहले के repair में गलती से चिकना वाला नहला मरवा देने से गायें अपने ही मलमूत्र से पिसल कर गिर जाती है और गायों (के मलमूत्र वाला कोमल स्थान) टूट जाने से 2-3 दिन में उनकी मौत हो जाती है।
विदेशी: और नयी दान वाली गायें आपस में लड़ती है तो भी उनके गिरने से मौत हो जाती है।
NKB: कितनी ऐसी गायें मरती होंगी।
विदेशी: लगभग हफ्ते में 2 से 3
NKB: तब तो गाय बहुत घट जाती होगी।
विदेशी: नहीं ऐसा नहीं है। जितनी जाती है उतनी आ जाती है। लगभग बराबर हिसाब रहता है। अपनी दूध वाली नहीं, मरती बाहर वाली जाती है।
विदेशी मुझे यही दिखाने चिकने नहले वाले शेड(ठूँठ गौओं की) में ले गया था जहां तदुपरांत मृत गाय को मैंने उसे दिखया।
मैं वहाँ विस्मित खड़ा यह सोचने लगा की 2-3 हफ्ते में यानि महीने में 8-10 व् साल में 100 से ज्यादा गो वंश की मौत अपने ही गोशाला में। आश्र्चजनक पहलू था ये।
क्रमश......